आंग्ल नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

 *आंग्ल नववर्ष की शुभकामनाएं* 


यह है उत्सवधर्मी भारत,

              अपने लाखों उत्सव महान।

संघर्षों में जीवन अपना ,

              है सबसे उत्तम उपादान।।

खुदके क्या और दूसरों के,

               हम उत्सव अपना लेते हैं।

खुश रहना अपनी फितरत है ,

            इस लिए सदा खुश रहते हैं।।


यह नया वर्ष यद्यपि ईसा , 

               फिर भी बधाइयां स्वीकारो।

अपना कब है यह याद रखो ,

              इसपर ही मत ठुमके मारो।।

माना यह बहुत प्रसिद्ध हुआ,

              पाश्चात्य सभ्यता के कारण।

लेकिन निजसंस्कृति मत भूलो,

                इस दुश्चरित्रता के कारण।।


मैं तो कवि उत्सवजीवी हूँ , 

               इसलिए हर्ष मुझको भी है।

जब चैत्र प्रतिपदा आएगी ,

               तब देखूंगा तुझको भी है।।

खुशियाँ सबकी सबको बाँटो ,

               वैश्वीकरण हो जाने दो।

पर मेरे अपने उत्सव जो,

               उनको भी मुझे मनाने दो।।


तुम थोप रहे क्यों अपनों को,

            मम उत्सव मुझे भुलाते क्यों।

मेरा मधुरिम संगीत तोड़,

              खुद टूटी बीन बजाते क्यों।।

क्यों वेद वाक्य को झुठलाते,

            क्यों इसे साम्प्रदायिक कहते।

जो वसुधा को परिवार कहे,

           क्यों उसे आततायिक कहते।।


हमने तो तेरे पर्व सभी,

                  अपने ही करके माने हैं।

पर क्यों तूने मेरी संस्कृति,

                  पर मारे लाखों ताने हैं।।

दी हीन भावना भर मन में,

                तुमने भारत जनमानस में।

सोने की चिड़िया कहलाता,

           है आज भुखमरी नसनस में।।


गुरुकुल की उचित व्यवस्था थी,

             कब जातिवाद पनपे उसमें।।

चारों वर्णों के शिष्य जहाँ,

              अध्ययनरत रहते थे वनमें।।

फिर उनकी रुचि देखी जाती,

           गुण से थी जाति प्रमाणिकता।

तब शिक्षा नीति बदल तुमने,

             बोई दुष्गर्हित  जातीयता।।


देखा जब एक ब्राह्मण के,

                  पंचांगनुरूप राष्ट्र सारा।

बनबाया नयी काल गणना,

                ईसवी को हमपर दे मारा।।

विक्रमादित्य को भुला हमें,

              ईसा को हमपर थोप दिया।।

जितना साहित्य हमारा था,

             मेथालॉजी  में  रोप दिया।।


अब कहते मदिरा जश्नों से,

                हमको नववर्ष मनाने को।

अन्तः वस्त्रों को पहन शिर्फ़,

           निज अंग अंग मटकाने को।।

हमतो कबका छुड़वादेते,

                तेरा थोपा यह नग्ननाच।

पर हावी आज हो गया है,

           पाश्चात्य सभ्यता का पिशाच।।


हे! भरत पुत्र! पुत्रियों सुनो,

            क्यों अपनी संस्कृति भूले हो।

क्यों भारत माँ की आत्मा को,

                छलने वालों पर फूले हो।।

क्यों कामकेलि को प्रेम समझ,

               अपना ही शोषण करते हो।

पश्चिमी दूषणों से गर्हित,

                 जीवन शैली में मरते हो।।


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  नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'

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