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गीत

गीत *सुना है तुम भी किसी रब की बात करते हो।* *गलों को काट ये किस ढब की बात करते हो।।* न कोई दीन न ईमान कहेगा ऐसा। न तो इलाह न भगवान कहेगा ऐसा।। न जाने कौन से करतब की बात करते हो। *गलों को काट ये किस ढब की बात करते हो।।* वतन में चैन-ओ-अमन और सुकूं रहे वो' करो! सभी के साथ जियो और दिलों में प्यार भरो। मिटा के आम को मंसब की बात करते हो। *गलों को काट ये किस ढब की बात करते हो।।* वजूद मुल्क के बिन क्या कहीं तुम्हारा है। इसी ने पाला' क़दम दर क़दम संवारा है।। जला के इसको ही मज़हब की बात करते हो। *गलों को काट ये किस ढब की बात करते हो।।* ✍🏾🌹💓🌹🪷🪷🪷 नित्यानन्द वाजपेयी "उपमन्यु"

गीत

गीत *पोखर तालाब सरोवर के, अंतस को मरते देखा है।* *इन रुग्ण हुई सरिताओं के, रस में विष भरते देखा है।।* देखा है मैंने नग्न नृत्य, इस भौतिकता की डायन का। सरकारों   द्वारा  घोषपत्र, में  झूठे जुमले गायन का।। सारे वादों-संवादों का, मदमोह बिखरते देखा है। *इन रुग्ण हुई सरिताओं के, रस में विष भरते देखा है।।* उद्योग क्रांति के अजगर ने, वन उपवन सारे निगल लिए। वसुधा की चूनर को उघाड़, सब वस्त्र उतारे निगल लिए।। मेघों का चित्त फटा उनको, डूबते उछरते देखा है। *इन रुग्ण हुई सरिताओं के, रस में विष भरते देखा है।।* है द्रवित हृदय हिमनद का भी, पिघला दिखलाई दिया मुझे। ज्वलामुखियों का अंतर्मन,उमगा दिखलाई दिया मुझे।।  गैसें विषाक्त वतायन की,नर को नित करते देखा है। *इन रुग्ण हुई सरिताओं के, रस में विष भरते देखा है।।* चिमनी से विष का उत्सर्जन, अपविष्टों से सरिता मर्दन। भूतल पहाड़ नभ वन उपवन, सबका मर्दन सबका दोहन।। पेट्रो ईंधन की विष बेलों , को "नित्य" अखरते देखा है। *इन रुग्ण हुई सरिताओं के, रस में विष भरते देखा है।।* हे! मनुसुत अब तो जाग नहीं, रसहीन धरा हो जायेगी। जीवन विहीन जल थल नभ म...

विश्व योग दिवस

*विश्व योग दिवस के पावन पर्व पर!* गीत *ज्ञान दीपक जला लो हृदय का मनुज,* *रोशनी से जगत जगमगा जाएगा।* *विश्व की आपदाएं मिटेंगी सभी,* *हर्ष उल्लास मनको लुभा जाएगा।।* स्वार्थ का जो अंधेरा मनों में बसा, है निगलने लगा आज आवाम को। लोभ-रावण खड़ा तान तलवार अब, और ललकारता है पुनः राम को।। यदि मिटेगा नहीं आर्थिक आचरण, तो सुनो यह सभी को मिटा जाएगा।। *ज्ञान दीपक जला लो हृदय का मनुज,* *रोशनी से जगत जगमगा जाएगा।* युद्ध है अर्थ का यह महा नाश को, नर हुआ भौतिकी का उपासक यहां। दंभ बारूद है दर्प बाती बना, और चिंगारियाँ है कुशासक यहां।। मौत का तांडवी नृत्य आतुर हुआ, यह अखिल विश्व की जड़ हिला जाएगा।। *ज्ञान दीपक जला लो हृदय का मनुज,* *रोशनी से जगत जगमगा जाएगा।* लौट आध्यात्मिक ज्ञान की ओर फिर, सर्व कल्याण हित शोध खुद में करो। व्यक्तिगत शुद्धतामय करो आचरण, सर्व समभाव पथ पर कदम तुम धरो। व्यक्ति में ब्रह्म का नित्य दर्शन करो, जीव चैतन्य प्रभु में समा जाएगा।। *ज्ञान दीपक जला लो हृदय का मनुज,* *रोशनी से जगत जगमगा जाएगा।* योग अष्टांग से नष्ट शुद्ध तन मन करो,  और पावन बनो मन वचन कर्म से। सांप्रदायिक नहीं स...

मुट्ठीभर हिमालय

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गीतों की वसुधा

गीतों की वसुधा गीतों की वसुधा

मां पिता

गीत कई पुत्रों सुताओं को सुधा ममता पिलाई है। पिता ने और माता ने जिन्हें दुनिया दिखाई है।। दिया है अर्श जीवन को मधुर संस्पर्श तन तन को। खिलाने श्वेद से सींचा सुता सुत रूप उपवन को।। निभा कर्तव्य को अपने पुहुप क्यारी सजाई है पिता ने और माता ने जिन्हें दुनिया दिखाई है।। हुये निर्बल अथक श्रम-साध्य जीवन ने किया जर्जर। बहाई स्नेह की गंगा बना परिवार तब उर्वर।। परिश्रम कर पिता-माँ उन्हें भेजी कमाई है। पिता ने और माता ने जिन्हें दुनिया दिखाई है।। नहीं खुद वस्त्र बनबाये न पैरों के लिए जूती। उन्हें दी जींस थी महँगी खरीदा स्वयं को सूती।। बनाये पुत्र सब शिक्षित सुता डॉक्टर बनाई है।। पिता ने और माता ने जिन्हें दुनिया दिखाई है।। उन्हीं निर्मोहियों पुत्रों सुताओं ने किया बेघर। बिना पदत्राण के तपती दुपहरी में फिरें दर दर।। किया फुटपाथ है बिस्तर खुला नभ ही रजाई है। पिता ने और माता ने जिन्हें दुनिया दिखाई है।। ✍🏾🎷 नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'

पिता

गीत वर्षा हो या हो कड़ी धूप, या हो जीवन की कुटिल घात। सर्वदा पिता पीकर विषाक्त, कटुता जीवन में करे प्रात।। जब जब संतानें दुःख प्राय, होती सहने में जगत क्षद्म। अपने जीवन का विभव त्याग, तब पिता बना पथ पुष्प पद्म।। जब अंधकार में सुता पुत्र, विचलित हो डरते देख रात। सर्वदा पिता पीकर विषाक्त, कटुता जीवन में करे प्रात।। हो उषा निशा रजनी विहान,या शीत ग्रीष्म वर्षा प्रहार। काँटों की परिणति करे पुष्प, बनता शुचिता मय सदाचार।। अष्टांग श्रमातुर हो अनन्य, मेटता दुखों की मलिन रात।  सर्वदा पिता पीकर विषाक्त, कटुता जीवन में करे प्रात।। शिक्षा दीक्षा रक्षा समीप,लाता बच्चों को खींच खींच। अधिकारों का दे हमें दान, कर्तव्य सुधा से सींच सींच।। उत्साह और भरता उलास,जीवन दर्शन का बन प्रपात। सर्वदा पिता पीकर विषाक्त, कटुता जीवन में करे प्रात।। ऊपर से दिखता है कठोर,वाणी से देता हृद झँझोड़। पर यदि दुख दाता बने अन्य, उसकी देता गर्दन मरोड़। करुणा वरुणालय बन अतुल्य, पहुँचता सुत को प्राण वात। सर्वदा पिता पीकर विषाक्त, कटुता जीवन में करे प्रात।। ✍🏾 नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'

मुट्ठी भर हिमालय

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ग्रीष्म

*गीत* *वसुंधरा का अंतस सुलगे, पुष्प और दल झुलस रहे।* *मरुथल जैसे तपते उपवन, बूंद-बूंद को तरस रहे।।* खग-मृग-व्याघ्र वृंद व्याकुल हैं, मुरझाई हैं कली-कली। लू-लपटें यूं धू-धू करतीं, धधक रहे घर-द्वार-गली।। पोखर का जल उबल रहा है, क्रोधित दिनकर परस रहे। *मरुथल जैसे तपते उपवन, बूंद-बूंद को तरस रहे।।* सरिता में जलचर अकुलाते,और गगन में विहग तपें। कच्ची मिट्टी की कुठरी में, नर नारी हरि नाम जपें।। सप्त पताल सूखते जैसे, अंगारे हों बरस रहे। *मरुथल जैसे तपते उपवन, बूंद-बूंद को तरस रहे।।* चीख दुपहरी में कीटों की,बागों  में गुंजार भरे। शुष्क हुए दल-फूल और फल, रस भी आर्त पुकार करे।। झुलस रहा तन-बदन धरा का, मेघ नहीं क्यों बरस रहे। *मरुथल जैसे तपते उपवन, बूंद-बूंद को तरस रहे।।* ✍🏾 नित्यानन्द वाजपेयी "उपमन्यु"