ग्रीष्म
*गीत*
*वसुंधरा का अंतस सुलगे, पुष्प और दल झुलस रहे।*
*मरुथल जैसे तपते उपवन, बूंद-बूंद को तरस रहे।।*
खग-मृग-व्याघ्र वृंद व्याकुल हैं, मुरझाई हैं कली-कली।
लू-लपटें यूं धू-धू करतीं, धधक रहे घर-द्वार-गली।।
पोखर का जल उबल रहा है, क्रोधित दिनकर परस रहे।
*मरुथल जैसे तपते उपवन, बूंद-बूंद को तरस रहे।।*
सरिता में जलचर अकुलाते,और गगन में विहग तपें।
कच्ची मिट्टी की कुठरी में, नर नारी हरि नाम जपें।।
सप्त पताल सूखते जैसे, अंगारे हों बरस रहे।
*मरुथल जैसे तपते उपवन, बूंद-बूंद को तरस रहे।।*
चीख दुपहरी में कीटों की,बागों में गुंजार भरे।
शुष्क हुए दल-फूल और फल, रस भी आर्त पुकार करे।।
झुलस रहा तन-बदन धरा का, मेघ नहीं क्यों बरस रहे।
*मरुथल जैसे तपते उपवन, बूंद-बूंद को तरस रहे।।*
✍🏾
नित्यानन्द वाजपेयी "उपमन्यु"
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें