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गीत

गीत नेहिल मेघमल्हार छेड़ घन, धरती को सहलाए। सरिता चिर यौवना हुई फिर, हृदय कलश भर लाए।। झर-झर अंबुद नेह धरा को, फेन वसन पहनाता। नवल बुलबुलों से आलोड़ित, भूमि अंग इठलाता।। धूल बन रही पंकज जननी, नद भी गीत सुनाए। सरिता चिर यौवना हुई फिर, हृदय कलश भर लाए।। रवि आक्रोश हुआ अब मद्धम, घनीभूत घन-दल है। पोखर प्यास बुझाते दिखते, जलरव भी अविरल है।। नर्म फुहारों से उपवन भी, दल पुष्पांगन पाए। सरिता चिर यौवना हुई फिर, हृदय कलश भर लाए।। कच्ची छतें सुगंधित सोंधी,महक बिखेर रहीं हैं। झुलसी लता पुनर्जीवित हैं, वसुधा घेर रहीं हैं।। देख नवल नटिनी सरिता को, इंद्र देव मुस्काए। सरिता चिर यौवना हुई फिर, हृदय कलश भर लाए।। ✍🏾🪷🪷🪷🪷🪷🪷 नित्यानन्द वाजपेयी "उपमन्यु"

गीत

गीत *चौराहे पर फांसी देदो, तालिबान जैसे चिंतन को।* *और कन्हैया की आत्मा सँग, शाँति दिला दो जन-गण-मन को!!* आज एक सर कलम हुआ है, कल सौ दो सौ हो जायेंगें। सोच अगर यह हावी होगी,  प्राण हिंद के घुट जायेंगें।। अस्तु कर्म फल इन्हें दिला दो, न्याय दिला दो विकल स्वजन को। *और कन्हैया की आत्मा सँग, शाँति दिला दो जन-गण-मन को!!* तुम इनको कहकर के बच्चे, जड़ भारत की कुतर रहे हो। भारत का खाते पीते पर, पाक नीति में पसर रहे हो।। इटली छोड़ो अब तो सोचो , भारत के इस अभिक्रंदन को।। *और कन्हैया की आत्मा सँग, शाँति दिला दो जन-गण-मन को!!* क्यों तुम डर-डर कर जीते, क्यों झूठे सेकुलर बनते हो। भारत की जड़ छोड़ अन्य की, जड़ को क्यों सिंचित करते हो।। तुष्टिकरण के इस कोल्हू में,मत पेरो भारत के जन को। *और कन्हैया की आत्मा सँग, शाँति दिला दो जन-गण-मन को!!* 🎷 नित्यानन्द वाजपेयी "उपमन्यु"

गीत

नज़्म *मेरी तनहाई को अंगार बनाया न करो।* *या तो' आजाओ' या' फिर याद भी' आया न करो।।* कितनी मुश्किल से मनाया है आज फिर मन को। तेरी यादों ने रुलाया है आज फिर मन को।। रब के मानिंद तू भाया है आज फ़िर मन को। ख़्वाब मिलने का मुझे ऐसे दिखाया न करो।। *या तो' आजाओ' या' फिर याद भी' आया न करो।।* रेत तपती मेरे एहसासों की है धू-धू कर। उसपे यादों की अगन जाती मुझे यूं छू कर।। यार दिलदार मेरे वास्ते भी कुछ तू कर। इस क़दर जिस्म-ओ- ज़हन मेरा जलाया न करो। *या तो' आजाओ' या' फिर याद भी' आया न करो।।* खिड़कियां तेरे ही रस्तों को निहारा करतीं। आहटें आने का जब भी हैं इशारा करतीं।। रातें इस गम को मेरे और उभारा करतीं मुझमें यूं ज्वार मुहब्बत का उठाया न करो। *या तो' आजाओ' या' फिर याद भी' आया न करो।।* रोज तुम कहते हो कल आके मिलूंगा तुमसे। होके दुनिया में सफल आके मिलूंगा तुमसे।। होगा जब रब का फ़ज़ल आके मिलूंगा तुमको।। अपनी तक़दीर को इतना भी सताया न करो। *या तो' आजाओ' या' फिर याद भी' आया न करो।।* ✍🏾 नित्यानन्द वाजपेयी "उपमन्यु...

गीत

गीत *मदभरी झील सी नीली हैं तुम्हारी आँखें।* *मैकदों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें।।* नाज़ो अंदाज़-ओ-अदा बिजली गिराती इनकी। मुझको दीवाना वफाएं भी बनाती इनकी।। शरबती शोख सजीली हैं तुम्हारी आँखें।। *मैकदों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें।।* सातों सागर से जियादा हैं कहीं राज़ इनमें। इतना कुछ कह के भी होती नहीं आवाज़ इनमें। कातिलाना और चुटीली हैं तुम्हारी आँखें। *मैकदों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें।।* नगमा-ए-इश्क को सुन सुन के तड़पती हैं ये। याद दिलवर की सताए तो छलकती हैं ये।। नील कंवलों सी रंगीली हैं तुम्हारी आँखें।। *मैकदों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें।।* शोख रुखसारों की चिलमन में ज्यों कि दो हीरे। दे के दीदार ज़माने को थके वो हीरे।। इस क़दर तन्हा लजीली हैं तुम्हारी आँखें।। *मैकदों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें।।* ✍🏾🌹🌿🍂🍃🌹 नित्यानन्द वाजपेयी "उपमन्यु"

गीत

नज़्म (गीत) *मेरी तनहाई को अंगारा बनाया न करो।* *या तो' आजाओ' या' फिर याद भी' आया न करो।।* कितनी मुश्किल से सँभाला है आज फिर मन को। तेरी यादों ने रुलाया है आज फिर मन को।। ख़्वाब मिलने का मुझे ऐसे दिखाया न करो। *या तो' आजाओ' या' फिर याद भी' आया न करो।।* रेत तपती मेरे एहसासों की है धू-धू कर। उसपे यादों की अगन जाती मुझे छू छू कर।। इस क़दर जिस्म-ओ- ज़हन मेरा जलाया न करो। *या तो' आजाओ' या' फिर याद भी' आया न करो।।* खिड़कियां तेरे ही रस्तों को निहारा करतीं। आहटें आने का जब-जब भी इशारा करतीं।। मुझमें यूं ज्वार मुहब्बत का उठाया न करो। *या तो' आजाओ' या' फिर याद भी' आया न करो।।* रोज तुम कहते हो कल आके मिलूंगा तुमसे। होके दुनिया में सफल आके मिलूंगा तुमसे।। अपनी तक़दीर को इतना भी सताया न करो। *या तो' आजाओ' या' फिर याद भी' आया न करो।।* ✍🏾 नित्यानन्द वाजपेयी "उपमन्यु"

गीत

ग़ज़ल ज़माने को वो बरगलाती है क्या क्या। महज़ झूठ लेकिन बताती है क्या क्या।। फरेबों की चादर में खुद को लपेटे, वो चांद और सूरज  बुझाती है क्या क्या।  वो सच को मेरे झूठ साबित कराने, ज़माने में जाने लुटाती है क्या क्या। *किसी और के तेरे मेरे सभी के,* *चुरा गीत दुनिया छपाती क्या क्या।* ज़माने में शुहरत कमाने को वो अब, लिखा तेरा मेरा चुराती है क्या क्या।। सिखाता रहा "नित्य" मेहनत जिसे मैं, वो मेहनत बिना जाने पाती है क्या क्या।।  ✍🏾🪷🤭 नित्यानन्द वाजपेयी "उपमन्यु"

गीत

गीत *निर्झरिणी झर-झर कर अविरल , निस्तब्ध निशा में शोर भरे।* *अरुणोदय अरुणाचल का  शुभ, सबसे पहले नवभोर करे।।* कच्ची भूधरियों की उर्वर , छाती हरियाली से लहके। वन में अनेक फल मूल कंद , मकरंद फूलपाती महके।। मधु स्निग्ध गंध से दसों दिशा, नंदनवन का आभास भरें। तितलियां दलों में फिरतीं यों, ज्यों हरित सिंधु में यान तरें।। वसुधा निज वक्ष निचोड़ रही, पयमृत की मधुरिम धार झरे। *अरुणोदय अरुणाचल का  शुभ, सबसे पहले नवभोर करे।।* कदली दल चंवर डुलाते हैं, साम्राज्ञी हरियाली के प्रति। उन्नत वक्षस्थल ऊष्णआर्द्र, ऊष्मित द्रुम वस्त्र ढली अनुकृति।। बाँसों के गहन वस्त्र पहने, ले प्रकृति सुंदरी अंगड़ाई। बेलें वृक्षों से अवगुंठित, छाई दिगंत पर मदनाई।। मन का मालिन्य मांद्यता सब, सरिताओें की जलधार हरे। *अरुणोदय अरुणाचल का  शुभ, सबसे पहले नवभोर करे।।* बदली का चुंबन लेने को, आशान्वित हैं यह तुंग श्रृंग। कोमल रसवंती कलियों पर, मंडराते मोहित नवल भृंग।। मरकत के दानों से बिखरे, दस-बीस घरों के विरल ग्राम। लाखों वनचर द्रुमचर विहंग, लाखों सरीसृपों हेतु धाम।। कितने ही प्रतिदिन धरें देह, जीवन का झुंड यहां विहर...