गीत
गीत
नेहिल मेघमल्हार छेड़ घन, धरती को सहलाए।
सरिता चिर यौवना हुई फिर, हृदय कलश भर लाए।।
झर-झर अंबुद नेह धरा को, फेन वसन पहनाता।
नवल बुलबुलों से आलोड़ित, भूमि अंग इठलाता।।
धूल बन रही पंकज जननी, नद भी गीत सुनाए।
सरिता चिर यौवना हुई फिर, हृदय कलश भर लाए।।
रवि आक्रोश हुआ अब मद्धम, घनीभूत घन-दल है।
पोखर प्यास बुझाते दिखते, जलरव भी अविरल है।।
नर्म फुहारों से उपवन भी, दल पुष्पांगन पाए।
सरिता चिर यौवना हुई फिर, हृदय कलश भर लाए।।
कच्ची छतें सुगंधित सोंधी,महक बिखेर रहीं हैं।
झुलसी लता पुनर्जीवित हैं, वसुधा घेर रहीं हैं।।
देख नवल नटिनी सरिता को, इंद्र देव मुस्काए।
सरिता चिर यौवना हुई फिर, हृदय कलश भर लाए।।
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नित्यानन्द वाजपेयी "उपमन्यु"
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