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राजीव दीक्षित

*छप्पय* मानवता के हेतु,भाव सेवा का लेकर। निकले श्री राजीव ,ज्ञान अंबुद विप्रेश्वर।। भारत को है गर्व ,पुत्र दीक्षित पर अपने। स्वाभिमान के नवल ,दिखाए जिसने सपने।। संभाषण से आपने,दिया अनोखा ज्ञान है। कम्पनियाँ परदेश की,जिनका कुचला मान है।। अंग्रेजी विष-वेल ,सोख लेती आरत को। अगर आपसा पुत्र, नहीं मिलता भारत को।। आयुर्वेदिक नींव, तुम्हीं ने थी दर्शाई। रामदेव ने भव्य ,पतंजलि जिसे बनाई।। जनजागृति के स्रोत तुम, ब्राम्हण पुत्र महान हो। जबतक सूरज चाँद हैं,तेरे यश का गान हो।। ✍🏾🌹🫐🌹 नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'

ग़ज़ल

ग़ज़ल  तेरे चेहरे को खिलता कँवल कर गया। एक भँवरा जो तुझपर मचल कर गया।। बंद दर था दिले मैंक़दे का मग़र। दे के' दस्तक़ कोई तो दखल कर गया।। साँकलें तो लगी की लगी रह गईं। चोर चालाकियाँ दरअसल कर गया।। ख़त का मज़मूम भाँपा लिफ़ाफे से बस। कुछ तो उसमें भी रद्दोबदल कर गया।। छू गईं उसकी साँसे बदन को तेरे। ख़्वाब पर इस क़दर वो अमल कर गया।। बच के निकला कोई मैक़दे से अगर। डूब आँखों में तेरी फ़िसल कर गया।। चाँद बासंतिया क्यों पिघलने लगा। क्या चकोर इसके' मन को मसल कर गया।। 'नित्य' साग़र तड़पने लगा प्यास में। अश्क़ पैमानों' में जब पिघल कर गया।। ✍🏾🌹🍃🌹🍃🍃🌹 नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'

ग़ज़ल

गज़ल नहीं वो चाहता था बेवज़ह हथियार हो जाना। लुटा सौ बार तब वह सोच पाया ख़ार हो जाना।। नहीं चाहत किसी की दरअसल बदकार हो जाना। भला जो शाखे गुल थी इक उसी का ख़ार हो जाना।। सताया है किसी ने इस क़दर उसको सरे बाज़ार। नहीं मुमक़िन नहीं, था उसका यूँ तलबार हो जाना। कभी जिस बाग में मैंने महीनों दिन गुज़ारे थे। बिना महबूब पल दो पल भी यूँ दुश्वार हो जाना।। सियासतदां हुए जबसे हमारे चाहने वाले। मुक़म्मल हो गया मेरा भी फ़िर मक्कार हो जाना।। बताएं हम अगर सबको तुम्हारी बेफाफाई यूँ। बहुत मुमक़िन है फ़िर इस आग का खूँखार हो जाना।। मुहब्बत ही ज़माने में फ़क़त है चीज़ ऐसी बस। दिलों पर दूसरे के जिसमें है इख़्तियार हो जाना।। नहीं मैं 'नित्य' इतना बेमुरब्बत हो सकूँगा अब। मेरी फ़ितरत नहीं है इस क़दर ग़द्दार हो जाना।। ✍🏾 नित्यानन्द उपमन्यु वाजपेयी

गीत

गीत *पाप दिन रात जग में कमाते रहे।* *जन्म मानुष का विरथा गँवाते रहे।।* आप आए यहाँ मुक्ति को खोजने। सत्य के मार्ग की युक्ति को खोजने।। आत्म अनुभूति पायी नहीं रंच भर। मन विषय भोग में ही रमाते रहे। *पाप दिन रात जग में कमाते रहे।* *जन्म मानुष का विरथा गँवाते रहे।।* ईश से लौ लगाने मिला जन्म था। आत्म उत्थान पाने मिला जन्म था।। छोड़ उद्देश्य पावन परित्राण का। वासना  की  नदी  में नहाते रहे।। *पाप दिन रात जग में कमाते रहे।* *जन्म मानुष का विरथा गँवाते रहे।।* कामना की कुटिल चाल में फस गए। भूमि थी दलदली आप क्यों धस गए।। खेल प्रतिबिंब से खेलकर हे! मनुज। मूल आराध्य  से  दूर जाते रहे।। *पाप दिन रात जग में कमाते रहे।* *जन्म मानुष का विरथा गँवाते रहे।।* आप संसार में  ही लिपट रह गए। सत्य अभिसार बिन ही सिमट रह गए।। सृष्टि  सौंदर्य  में लोभ पाला मगर। क्यों सृजक से सदा मन चुराते रहे।। *पाप दिन रात जग में कमाते रहे।* *जन्म मानुष का विरथा गँवाते रहे।।* ✍🏾 नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'