नग़मा
*नग़मा* हूँ आप का नसीब ज़रा पास आइये। ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।। दिन आज का हसीन बड़ा आप साथ हैं। ये गुल नशे में चूम रहे सुर्ख़ हाथ हैं।। मौसम पुकारता है मधुर गीत गाइये। ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।। मुद्दत से' शाम आज ये' रंगीन हो रही। फ़िर क्यों नज़र हुज़ूर कि ग़मगीन हो रही।। क्या है अज़ीब राज हमें भी सुनाइये। ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।। बेज़ार वो कली जो' खिली फूल है बनी। है ओस की हसीन फ़िज़ा रंग में सनी।। अब रूठ बैठिये न दिले दर्द पाइये।। ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।। हम हैं हबीब आप फ़क़त नस्र हो हमें। क्यों काँपते गुलाब से' लब सुर्ख़ हैं थमें। मत रोकिये इन्हें क़रीब और लाइये।। ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।। 🖊️🌹🌹🌹🌹🌹🌹 नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'