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नग़मा

 *नग़मा*   हूँ आप का नसीब ज़रा पास आइये।  ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।।  दिन आज का हसीन बड़ा आप साथ हैं।  ये गुल नशे में चूम रहे सुर्ख़ हाथ हैं।।  मौसम पुकारता है मधुर गीत गाइये।  ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।।   मुद्दत से' शाम आज ये' रंगीन हो रही।  फ़िर क्यों नज़र हुज़ूर कि ग़मगीन हो रही।।  क्या है अज़ीब राज हमें भी सुनाइये।  ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।।  बेज़ार वो कली जो' खिली फूल है बनी।  है ओस की हसीन फ़िज़ा रंग में सनी।।  अब रूठ बैठिये न दिले दर्द पाइये।।  ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।।   हम हैं हबीब आप फ़क़त नस्र हो हमें।  क्यों काँपते गुलाब से' लब सुर्ख़ हैं थमें।  मत रोकिये इन्हें क़रीब और लाइये।।  ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।।   🖊️🌹🌹🌹🌹🌹🌹  नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'

क्षति

 *कादम्बिनी और नंदन बाल पत्रिका का बन्द होना अपूरणीय छति* ईमानदारी से कहूँ तो इन दोनों पत्रिकाओं को मैंने कभी पढा नही  क्योंकि एक गृहणी होने के नाते मैंने पुस्तको से  ज्यादा अनुभव जीवन से प्राप्त किया है जो महसूस किया उन्हें शब्दो में ढालने की कोशिश की है , परन्तु मैं ये समझ पा रही हूँ कि कादम्बिनी पत्रिका के बंद होने पर जो प्रतिक्रियाएं आ रही है, लोग जो सम्वेदनाएँ व्यक्त कर रहे है उसका बंद होना दुखद बताया जा है उससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि कादम्बिनी ने हमारे देश को ऐसे कन्टेन्ट दिए है जिसने आर्थिक ,समाजिक राजनैतिक ,धार्मिक और सबसे ज्यादा साहित्य को समृद्ध किया है ....अब प्रश्न उठता है कि ये बंद क्यों हो रहा है तो हम सिर्फ अपनी समझ के हिसाब से अटकलें लगा सकते है ,शायद आर्थिक मंदी इसका पहला कारण हो सकता है ,दूसरा आज सूचनाएँ हमे सरलता और सहजता से प्राप्त हो रही है इंटरनेट इसका सबसे सरल माध्यम है । मिनटों में हम पूरी दुनिया की जानकारी प्राप्त कर लेते है। आज पाठको का दायरा सिमटने लगा है लोग पढ़ना कम सुनना ज्यादा पसंद कर रहे है ,कहना गलत न होगा कि शॉर्टकट जमाना आ ग...

ग़जल

   *विधा -- गजल*  मुझमें' जलने की'आस रहने दो, तुम मुझे आसपास रहने दो।। तुम शमा हुश्न की यक़ी मेरा, मेरी' शिद्दत में' प्यास रहने दो।। रौशनी तुम से' है ज़माने में , मेरे' दिल में उजास रहने दो। मैं रहा आज़ तक सुनो बेदर, अब मुझे और ख़ास रहने दो। 'नित्य' बहता रहा तुझी में तो, फ़िर भी' ग़र है उदास रहने दो। 🖊️🖊️🖊️🖊️🖊️🖊️🖊️ नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'

गीत

 *गीत*  फिर जगी आज प्यार की लत है। रात भर फिर चकोर सी गत है।। माहताबी  तुम्हारी  शबनम सी। गा रही हैं कली पे सरगम सी।। हो रही फिर हसीन बरक़त है।। फिर जगी आज प्यार की लत है। रात भर फिर चकोर सी गत है।। रागिनी ने मधुर बजाई धुन। फिर पपीहा गुमान में है सुन।। हुश्न की फ़िर हुई निज़ामत है। फिर जगी आज प्यार की लत है। रात भर फिर चकोर सी गत है।। रूह भी ज्यूँ सिहर गयी अब तो। ज़िस्म से जाँ निकल गयी अब तो।। होश    खोती    हुई    मुहब्बत है।। फिर जगी आज प्यार की लत है। रात भर फिर चकोर सी गत है।। है जवां दिल कहीं बहक जाए। कोइ शोला अग़र दहक जाए।। बन पड़ी आपको तिज़ारत है। फिर जगी आज प्यार की लत है। रात भर फिर चकोर सी गत है।। नित्यानन्द वाजपेयी।✍️🌹

पाञ्चजन्य काव्यप्रसून

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  पाञ्चजन्य काव्य प्रसून   पाञ्चजन्य काव्यप्रसून

पाञ्चजन्य काव्यप्रसून ई-पत्रिका

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विदाई

 दिनाँक - 31/12/2020 दिन - गुरुवार विषय - *विदाई* विधा - सरसी छंद गीत , 16/12 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ खट्टी-मीठी यादों को दे , चला वर्ष यह बीस । आने वाला वर्ष सुखद हो , कृपा करो जगदीश ।। महाकाल कोरोना बनकर , दिया सभी को पीर । किया सामना मगर मनुज ने , धारण करके धीर । जाने कितने प्राण हरण कर , बना साल यह क्रूर । मगर मनुज की बुद्धि शक्ति से , हुई समस्या दूर । करो विदाई अब कष्टों की , उन्हें झुकाकर शीश । खट्टी-मीठी यादों को दे , चला वर्ष यह बीस ।। उथल-पुथल से भरा हुआ यह , साल दिया यह ज्ञान । संघर्षों का करो सामना , तभी मिले अवदान । सुख-दुख चलते साथ सदा ही , सत्य यही स्वीकार । वर्ष बीस की सुखमय घड़ियाँ , निज मन लेना धार । जाते-जाते यह कर जाना , मिटे हृदय की टीस । खट्टी-मीठी यादों को दे , चला वर्ष यह बीस ।। अच्छे मन से करें विदाई , लेकर नूतन आस । गमन करो अब वर्ष पुरातन , लाओ नया उजास । परिवर्तन की बेला आई , रखो अटल विश्वास । सुखमय यह संसार बनेगा , नया वर्ष है खास । हृदय खोलकर सभी करें अब , स्वागत सन इक्कीस । खट्टी-मीठी यादों को दे , चला वर्ष यह बीस ।।          *इन...

शारदे वन्दना

*सरस्वती वन्दना*  वागेश्वरी कृपा कर, सुर ताल लय मिला दो। शुचि ज्ञान गंग देवी, वेदाङ्ग सरि पिला दो।। गीता रुचिर स्वरों की,ऋषि व्यास को सुझाई। कवि  कालिदास  उर  में, ज्यों  मेघदूत आई।। कवि गंग के हृदय में,  दे शुद्ध  हिन्द  बोली।  आरोह शब्द जागे , पुट  चंद  छन्द   खोली।।  इनके समान ही माँ,  शुभ ज्ञान प्राञ्जला दो।। वागेश्वरी कृपा कर, सुर ताल लय मिला दो। शुचि ज्ञान गंग देवी, वेदाङ्ग सरि पिला दो।। तुलसी कबीर  मीरा, सब  हैं  विभा  तुम्हारी। श्री सूर दास जायसि, तव ज्ञान रश्मि न्यारी।। सुधि सूर्यकांत,दिनकर,वे प्रेमचंद , शंकर। थे और भी अनेकों , तेरी   प्रभा  शुभंकर।। मम आत्म प्रेरणा को, लालित्य मंजुला दो।। वागेश्वरी कृपा कर, सुर ताल लय मिला दो। शुचि ज्ञान गंग देवी, वेदाङ्ग सरि पिला दो।। हों प्रस्फुटित अनेकों,  पुट शब्द कोष के माँ। संचार श्लाघ्यता हो,  रस  छन्द  तोष से माँ।। वरदान दे मुझे माँ,    मैं  शब्द   ब्रह्म   मानूँ। शुभ अभ्र ...

नववर्ष

 *बाय बाय ,, 2020 स्वागतम् 2021* 🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃 सन दो हजार है बीस प्रबल , संघर्षों को सिखलाया है अपनेपन रिश्ते नातों का , इसने एहसास कराया है कीमत समझी है रोटी की , धीरज धरना भी सीख लिया भूँखे रह रहकर के हमने , अरि से लड़ना भी सीख लिया पढ़ने सीखे है धर्म ग्रंथ , पूजा जप तप करना सीखा ब्यूटी पार्लर श्रृंगार बिना , हर स्त्री ने रहना सीखा बूढ़े पितु मातु बहन भाई , गुरु मित्र साथ पल बीते है स्नेह श्रेष्ठ जन का पाकर , बोलो हम क्यों फिर रीते है जिनके खर्चे रहते अपार , होटल में भोजन करते है बिन आइस्क्रीम चाट टिक्की , के भी बच्चे रह सकते है ये सच है हम भयभीत हुए , कृंदित हो होकर चीखे है संयम समता सत्कर्म शौर्य , संस्कार सभ्यता सीखे है हम राम कृष्ण के वंशज है , हम कालकूठ पीने वाले कर राजभोग का त्याग और , जंगल में हम जीने वाले हम है भैरव के वीरभद्र हम शेष नाग अवतारी...

पुरुष

 पुरुष कैसे कर लेते हो तुम निष्ठुर होने का इतना उम्दा अभिनय जबकि जानती हूं मैं रोते हो तुम भी कई बार कारण होते हैं कुछ ऐसे नहीं कह पाते तुम किसी से अपने बच्चों की मां के कारण जब अनदेखी करते हो अपनी मां की तब जानती हूं कि तुम भीतर ही भीतर कोसते हो खुद के अंदर के बेटे को... हर रोज तुम घुटते हो सोच कर अपनी मां के वो सारे संघर्ष जो किए थे उसने तुमको पालने के कारण कभी धन का अभाव कभी साधनों की कमी कभी कभी तो वो झूठ बोलकर भी तुमको खिला देती थी आम कहकर कि मुझे आम पसंद नहीं.... सोख लेते हो तुम आने से पहले ही आंखो के आंसू बता देते हो मां को व्यस्तता नौकरी की भीड़ ट्रेन की दूरी घर की कमी समय की पर कभी नहीं बता पाते तुम कि अब तुम बेटे कम रह गए हो.... *शिवानी विनय सिंह*