नग़मा
*नग़मा*
हूँ आप का नसीब ज़रा पास आइये।
ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।।
दिन आज का हसीन बड़ा आप साथ हैं।
ये गुल नशे में चूम रहे सुर्ख़ हाथ हैं।।
मौसम पुकारता है मधुर गीत गाइये।
ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।।
मुद्दत से' शाम आज ये' रंगीन हो रही।
फ़िर क्यों नज़र हुज़ूर कि ग़मगीन हो रही।।
क्या है अज़ीब राज हमें भी सुनाइये।
ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।।
बेज़ार वो कली जो' खिली फूल है बनी।
है ओस की हसीन फ़िज़ा रंग में सनी।।
अब रूठ बैठिये न दिले दर्द पाइये।।
ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।।
हम हैं हबीब आप फ़क़त नस्र हो हमें।
क्यों काँपते गुलाब से' लब सुर्ख़ हैं थमें।
मत रोकिये इन्हें क़रीब और लाइये।।
ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।।
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नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'
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