शारदे वन्दना
*सरस्वती वन्दना*
वागेश्वरी कृपा कर, सुर ताल लय मिला दो।
शुचि ज्ञान गंग देवी, वेदाङ्ग सरि पिला दो।।
गीता रुचिर स्वरों की,ऋषि व्यास को सुझाई।
कवि कालिदास उर में, ज्यों मेघदूत आई।।
कवि गंग के हृदय में, दे शुद्ध हिन्द बोली।
आरोह शब्द जागे , पुट चंद छन्द खोली।।
इनके समान ही माँ, शुभ ज्ञान प्राञ्जला दो।।
वागेश्वरी कृपा कर, सुर ताल लय मिला दो।
शुचि ज्ञान गंग देवी, वेदाङ्ग सरि पिला दो।।
तुलसी कबीर मीरा, सब हैं विभा तुम्हारी।
श्री सूर दास जायसि, तव ज्ञान रश्मि न्यारी।।
सुधि सूर्यकांत,दिनकर,वे प्रेमचंद , शंकर।
थे और भी अनेकों , तेरी प्रभा शुभंकर।।
मम आत्म प्रेरणा को, लालित्य मंजुला दो।।
वागेश्वरी कृपा कर, सुर ताल लय मिला दो।
शुचि ज्ञान गंग देवी, वेदाङ्ग सरि पिला दो।।
हों प्रस्फुटित अनेकों, पुट शब्द कोष के माँ।
संचार श्लाघ्यता हो, रस छन्द तोष से माँ।।
वरदान दे मुझे माँ, मैं शब्द ब्रह्म मानूँ।
शुभ अभ्र लेखनी से, नव वेदवाक्य ठानूँ।।
कोई न एषणा हो , हृद दिव्य उज्वला दो।
वागेश्वरी कृपा कर, सुर ताल लय मिला दो।
शुचि ज्ञान गंग देवी, वेदाङ्ग सरि पिला दो।।
निज लेखनी सुपुष्पित, जगदम्ब पद झुकाऊँ।
अति सारगर्विता से, तेरी विनय सुनाऊँ।।
सन्मार्ग पर चलूँ मैं, तेरे सुगीत गाऊँ।
निः स्वार्थ दूसरों को, सद्ज्ञान से सिंचाऊँ।।
ऐसी प्रगल्भ विद्या, मुझको समुज्वला दो।।
वागेश्वरी कृपा कर, सुर ताल लय मिला दो।
शुचि ज्ञान गंग देवी, वेदाङ्ग सरि पिला दो।।
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नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'
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