पुरुष
पुरुष कैसे कर लेते हो तुम निष्ठुर होने का इतना उम्दा अभिनय जबकि जानती हूं मैं रोते हो तुम भी कई बार कारण होते हैं कुछ ऐसे नहीं कह पाते तुम किसी से अपने बच्चों की मां के कारण जब अनदेखी करते हो अपनी मां की तब जानती हूं कि तुम भीतर ही भीतर कोसते हो खुद के अंदर के बेटे को... हर रोज तुम घुटते हो सोच कर अपनी मां के वो सारे संघर्ष जो किए थे उसने तुमको पालने के कारण कभी धन का अभाव कभी साधनों की कमी कभी कभी तो वो झूठ बोलकर भी तुमको खिला देती थी आम कहकर कि मुझे आम पसंद नहीं.... सोख लेते हो तुम आने से पहले ही आंखो के आंसू बता देते हो मां को व्यस्तता नौकरी की भीड़ ट्रेन की दूरी घर की कमी समय की पर कभी नहीं बता पाते तुम कि अब तुम बेटे कम रह गए हो.... *शिवानी विनय सिंह*
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