क्षति

 *कादम्बिनी और नंदन बाल पत्रिका का बन्द होना अपूरणीय छति*

ईमानदारी से कहूँ तो इन दोनों पत्रिकाओं को मैंने कभी पढा नही  क्योंकि एक गृहणी होने के नाते मैंने पुस्तको से  ज्यादा अनुभव जीवन से प्राप्त किया है जो महसूस किया उन्हें शब्दो में ढालने की कोशिश की है , परन्तु मैं ये समझ पा रही हूँ कि कादम्बिनी पत्रिका के बंद होने पर जो प्रतिक्रियाएं आ रही है, लोग जो सम्वेदनाएँ व्यक्त कर रहे है उसका बंद होना दुखद बताया जा है उससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि कादम्बिनी ने हमारे देश को ऐसे कन्टेन्ट दिए है जिसने आर्थिक ,समाजिक राजनैतिक ,धार्मिक और सबसे ज्यादा साहित्य को समृद्ध किया है ....अब प्रश्न उठता है कि ये बंद क्यों हो रहा है तो हम सिर्फ अपनी समझ के हिसाब से अटकलें लगा सकते है ,शायद आर्थिक मंदी इसका पहला कारण हो सकता है ,दूसरा आज सूचनाएँ हमे सरलता और सहजता से प्राप्त हो रही है इंटरनेट इसका सबसे सरल माध्यम है । मिनटों में हम पूरी दुनिया की जानकारी प्राप्त कर लेते है। आज पाठको का दायरा सिमटने लगा है लोग पढ़ना कम सुनना ज्यादा पसंद कर रहे है ,कहना गलत न होगा कि शॉर्टकट जमाना आ गया है । मैं ये नही कह रही कि अब किताबे बिलकुल नही पढ़ी जा रही है पर पाठक कम हुए है श्रोता ज्यादा ....आज साहित्य के भी मायने बदलते नजर आ रहे है ।पुर्व में कुछ मापदंड या मानक तय होते थे  जिसका आधार उत्कृष्टता, परिष्कृत भाषा या मूल्यपरक विषय वस्तु होते थे जितना समय किताबें तैयार होने में लगता था उतना ही समय पाठकों तक पहुंचने में लगता था पर जब वो पाठकों तक पहुंचता तो वो पढ़ने की ललक जगती और पढ़ने के बाद एक खुसी एक सन्तुष्टि और ऐसी सामग्री जो समाज को दिशा निर्देश करती और परिवर्तन लाने का कार्य करती थी पर परिवर्तन के इस दौर में बहुत कुछ बदल चुका है ..आज हर तीसरा व्यक्ति लेखक या कवि है और सम्पादक तो कुकरमुत्ते की भांति पैदा हो रहे है ..सब अपना वर्चस्व स्थापित करने में लगे है ...वर्चस्व की इस भयावह प्रतिस्पर्धा ने समाज और व्यक्ति को इस हद तक दिग्भ्रमित कर दिया है कि समझ नही आता कि क्या करे किस ओर जाएँ ....देश की कई नामी हिंदी पत्रिकाएँ आज बंद होने के कगार पर है और कुछ हो भी चुकी है ऐसे में पूरे देश से ये प्रतिक्रिया आ रही है कि ये समाचार दुखद है और साहित्य प्रेमियों के लिए पीड़ादायक है बिलकुल है होना भी चाहिए पर मेरा एक सवाल है जब हमें शारीरिक पीड़ा होती है तो हम उसका इलाज ढूंढते है चाहे हम आर्थिक अभाव में हो तो भी ...आज एक ट्रेंड सा चला है दुख व्यक्त करने का वो भी सोशल मीडिया पे चाहे उस विषय वस्तु से उनका दूर दूर तक कोई सम्बन्ध न हो तो भी भेंड़ चाल चलना ,भीड़ में शामिल होना फैशन बन गया है ।।मैं अपना छोटा सा अनुभव साझा कर रही हूँ मैं कई वर्षों से गीता प्रेस की मासिक पत्रिका और वार्षिक भी मगाती हूँ एक दिन सोशल मीडिया में मैने ये खबर पढ़ी की जल्द ही गीता प्रेस बंद होने वाला है इस खबर ने मानो मेरे शरीर से जैसे प्राण ही निकाल दिया हो जब हम पुस्तको से अपना नाता जोड़ लेते है तो उनसे हमारा आत्मिक लगाव हो जाता है अगर आपको भी इन दोनों पत्रिका से अपनापन है जुड़ाव है तो इसे बंद होने से रोकें . ..माना कि आज हम सब आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहे है ये किसी एक कि नही बल्कि विश्वव्यापी समस्या है , ये भी सही है कि अर्थ बिना सब व्यर्थ ...आज एक महामारी ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया ...जब जंग जिंदगी से हो तो बांकी सभी बातें गौण हो जाती है ...जिंदगी बचाने के जद्दोजहद ने सम्पूर्ण मानव जाति पर प्रभाव डाला है, जिंदगी डर और भय के साये में गुजर रही है ठहराव है पर फिर भी हम सब अपना काम कर रहे है ...आर्थिक मंदी के इस दौर में भी हम अपनी सारी जरूरतों का ख्याल रख रहे है यदि हम अपनी देश की शिक्षा संस्कृति और कला की विरासत को बचाने के लिए कुछ पैसे खर्च भी का देंगे तो बेकार नही जाएगा ....

भावना द्विवेदी

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

नित्यानन्द वाजपेयी एक साहित्यिक परिचय

ग़ज़ल