ग़ज़ल
ग़ज़ल
तेरे चेहरे को खिलता कँवल कर गया।
एक भँवरा जो तुझपर मचल कर गया।।
बंद दर था दिले मैंक़दे का मग़र।
दे के' दस्तक़ कोई तो दखल कर गया।।
साँकलें तो लगी की लगी रह गईं।
चोर चालाकियाँ दरअसल कर गया।।
ख़त का मज़मूम भाँपा लिफ़ाफे से बस।
कुछ तो उसमें भी रद्दोबदल कर गया।।
छू गईं उसकी साँसे बदन को तेरे।
ख़्वाब पर इस क़दर वो अमल कर गया।।
बच के निकला कोई मैक़दे से अगर।
डूब आँखों में तेरी फ़िसल कर गया।।
चाँद बासंतिया क्यों पिघलने लगा।
क्या चकोर इसके' मन को मसल कर गया।।
'नित्य' साग़र तड़पने लगा प्यास में।
अश्क़ पैमानों' में जब पिघल कर गया।।
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नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'
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