ग़ज़ल

गज़ल

नहीं वो चाहता था बेवज़ह हथियार हो जाना।
लुटा सौ बार तब वह सोच पाया ख़ार हो जाना।।

नहीं चाहत किसी की दरअसल बदकार हो जाना।
भला जो शाखे गुल थी इक उसी का ख़ार हो जाना।।

सताया है किसी ने इस क़दर उसको सरे बाज़ार।
नहीं मुमक़िन नहीं, था उसका यूँ तलबार हो जाना।

कभी जिस बाग में मैंने महीनों दिन गुज़ारे थे।
बिना महबूब पल दो पल भी यूँ दुश्वार हो जाना।।

सियासतदां हुए जबसे हमारे चाहने वाले।
मुक़म्मल हो गया मेरा भी फ़िर मक्कार हो जाना।।

बताएं हम अगर सबको तुम्हारी बेफाफाई यूँ।
बहुत मुमक़िन है फ़िर इस आग का खूँखार हो जाना।।

मुहब्बत ही ज़माने में फ़क़त है चीज़ ऐसी बस।
दिलों पर दूसरे के जिसमें है इख़्तियार हो जाना।।

नहीं मैं 'नित्य' इतना बेमुरब्बत हो सकूँगा अब।
मेरी फ़ितरत नहीं है इस क़दर ग़द्दार हो जाना।।
✍🏾
नित्यानन्द उपमन्यु वाजपेयी

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