गीत
ग़ज़ल
ज़माने को वो बरगलाती है क्या क्या।
महज़ झूठ लेकिन बताती है क्या क्या।।
फरेबों की चादर में खुद को लपेटे,
वो चांद और सूरज बुझाती है क्या क्या।
वो सच को मेरे झूठ साबित कराने,
ज़माने में जाने लुटाती है क्या क्या।
*किसी और के तेरे मेरे सभी के,*
*चुरा गीत दुनिया छपाती क्या क्या।*
ज़माने में शुहरत कमाने को वो अब,
लिखा तेरा मेरा चुराती है क्या क्या।।
सिखाता रहा "नित्य" मेहनत जिसे मैं,
वो मेहनत बिना जाने पाती है क्या क्या।।
✍🏾🪷🤭
नित्यानन्द वाजपेयी "उपमन्यु"
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