पिता
गीत
वर्षा हो या हो कड़ी धूप, या हो जीवन की कुटिल घात।
सर्वदा पिता पीकर विषाक्त, कटुता जीवन में करे प्रात।।
जब जब संतानें दुःख प्राय, होती सहने में जगत क्षद्म।
अपने जीवन का विभव त्याग, तब पिता बना पथ पुष्प पद्म।।
जब अंधकार में सुता पुत्र, विचलित हो डरते देख रात।
सर्वदा पिता पीकर विषाक्त, कटुता जीवन में करे प्रात।।
हो उषा निशा रजनी विहान,या शीत ग्रीष्म वर्षा प्रहार।
काँटों की परिणति करे पुष्प, बनता शुचिता मय सदाचार।।
अष्टांग श्रमातुर हो अनन्य, मेटता दुखों की मलिन रात।
सर्वदा पिता पीकर विषाक्त, कटुता जीवन में करे प्रात।।
शिक्षा दीक्षा रक्षा समीप,लाता बच्चों को खींच खींच।
अधिकारों का दे हमें दान, कर्तव्य सुधा से सींच सींच।।
उत्साह और भरता उलास,जीवन दर्शन का बन प्रपात।
सर्वदा पिता पीकर विषाक्त, कटुता जीवन में करे प्रात।।
ऊपर से दिखता है कठोर,वाणी से देता हृद झँझोड़।
पर यदि दुख दाता बने अन्य, उसकी देता गर्दन मरोड़।
करुणा वरुणालय बन अतुल्य, पहुँचता सुत को प्राण वात।
सर्वदा पिता पीकर विषाक्त, कटुता जीवन में करे प्रात।।
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नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'
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