गीत
गीत
*पोखर तालाब सरोवर के, अंतस को मरते देखा है।*
*इन रुग्ण हुई सरिताओं के, रस में विष भरते देखा है।।*
देखा है मैंने नग्न नृत्य, इस भौतिकता की डायन का।
सरकारों द्वारा घोषपत्र, में झूठे जुमले गायन का।।
सारे वादों-संवादों का, मदमोह बिखरते देखा है।
*इन रुग्ण हुई सरिताओं के, रस में विष भरते देखा है।।*
उद्योग क्रांति के अजगर ने, वन उपवन सारे निगल लिए।
वसुधा की चूनर को उघाड़, सब वस्त्र उतारे निगल लिए।।
मेघों का चित्त फटा उनको, डूबते उछरते देखा है।
*इन रुग्ण हुई सरिताओं के, रस में विष भरते देखा है।।*
है द्रवित हृदय हिमनद का भी, पिघला दिखलाई दिया मुझे।
ज्वलामुखियों का अंतर्मन,उमगा दिखलाई दिया मुझे।।
गैसें विषाक्त वतायन की,नर को नित करते देखा है।
*इन रुग्ण हुई सरिताओं के, रस में विष भरते देखा है।।*
चिमनी से विष का उत्सर्जन, अपविष्टों से सरिता मर्दन।
भूतल पहाड़ नभ वन उपवन, सबका मर्दन सबका दोहन।।
पेट्रो ईंधन की विष बेलों , को "नित्य" अखरते देखा है।
*इन रुग्ण हुई सरिताओं के, रस में विष भरते देखा है।।*
हे! मनुसुत अब तो जाग नहीं, रसहीन धरा हो जायेगी।
जीवन विहीन जल थल नभ में, प्रभुता मलीन हो जायेगी।।
मैंने जगती की आंखो से ,पीड़ा को झरते देखा है।
*इन रुग्ण हुई सरिताओं के, रस में विष भरते देखा है।।*
©®✍🏾
आचार्य
नित्यानन्द वाजपेयी "नित्योपमन्यु "
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें