गीत

गीत

*सुना है तुम भी किसी रब की बात करते हो।*
*गलों को काट ये किस ढब की बात करते हो।।*

न कोई दीन न ईमान कहेगा ऐसा।
न तो इलाह न भगवान कहेगा ऐसा।।
न जाने कौन से करतब की बात करते हो।
*गलों को काट ये किस ढब की बात करते हो।।*

वतन में चैन-ओ-अमन और सुकूं रहे वो' करो!
सभी के साथ जियो और दिलों में प्यार भरो।
मिटा के आम को मंसब की बात करते हो।
*गलों को काट ये किस ढब की बात करते हो।।*

वजूद मुल्क के बिन क्या कहीं तुम्हारा है।
इसी ने पाला' क़दम दर क़दम संवारा है।।
जला के इसको ही मज़हब की बात करते हो।
*गलों को काट ये किस ढब की बात करते हो।।*

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नित्यानन्द वाजपेयी "उपमन्यु"

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