ग़जल
ग़जल
बह्र: 121 22 121 22
वो' जब से' दिल में उतर गये हैं
ख़ुदा क़सम हम सँवर गये हैं।।
मिज़ाज में है अज़ीब शोख़ी ,
उसी में' खोकर बिखर गये हैं
कली हज़ारों हैं' गुलशनों में,
मग़र उन्हीं पर ठहर गये हैं।।
अशआर मेरा हुआ मुख़ातिब,
पढ़ा तो' कितना निखर गये हैं।
गुलाब की पाँखुरी मुक़म्मल,
मश्रण पे' मेरे अधर गये हैं।।
वहीं हैं अबतक जहाँ मिले थे ,
इधर गये ना उधर गये हैं।।
कि 'नित्य' उनका इलाज़ है क्या ? ,
जो' मर गये या मुकर गये हैं।
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नित्यानन्द वाजपेयी "उपमन्यु"
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