ग़जल


विधा --गजल

अपने इस अहल-ए- वतन पर जो फ़िदा हो जाएगा।
इस चमन में बस उसी का क़ायदा हो जाएगा।।

खुद की हस्ती को मिटाना सबके बस में है नहीं,
मिट सका ग़र तो वही फिर नाख़ुदा हो जाएगा।।

आज़ कलियां हैं परागित चूमते कितने भ्रमर,
जब ख़िज़ाँ आयेगी तब भँवरा ज़ुदा हो जाएगा।

है हमारी माँ का ओहदा इस जहां में उच्चतर,
क़र्ज़ क्या इस जन्म में उनका अदा हो जाएगा?

खून में मेरे महक है इस वतन की ख़ाख की,
ख़ाख में मिलकर इसी की यह फ़ना हो जाएगा।।

ज़ख्म मेरे दिल में कोई सूखता सा था मग़र,
शाज़िसाना हरक़तों से फ़िर हरा हो जाएगा।।

खोके मिट्टी में वतन की 'नित्य' गुल बनकर खिलो।
तब वतन महबूब मेरा ख़ुशनुमा हो जाएगा।।

🖊️
नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'

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