मनमनोरम छन्द

2122 2122 2122 2122


जिंदगी के आज ऐसे मोड़ पर आकर खड़े हैं

देखकर   हालात  उर  उद्गार  मेरे  रो  पड़े  हैं


मन  व्यथित  है  आज   मेरा 

तन    थका     लाचार      है

दीप  आशा    का   बुझा   है

हर     तरफ    अँधियार    है

है   समय   प्रतिकूल  अपना

पंथ    कंटक    से    भरे    हैं

चैन  अब  मिलता  नही  हम

घोर    विपदा    में    घिरे   हैं

चल रहा प्यासा पथिक यह दूर पानी के घड़े हैं


कर   रहे   संघर्ष   प्रतिदिन

बस   निराशा   हाथ  लगती

है   तमस   में  जिंदगी   यह

आस की किरणें न  दिखती

दरबदर   मिलती  हैं  ठोकर

टूटते     हैं    आज     सपने

देख    व्याकुलता     हमारी

हस  रहे  हैं    आज   अपने

अश्रु  मेरे  बह   रहे  हैं  घाव  अंतस में बड़े हैं


लग रहे  मधुमास  पतझड़

सूखती    कोमल     लताएं

जिंदगी   के    कर्मपथ  पर

मिल  रहीं नित विफलताएं

शांत  हूँ   एकांत   में   बस

सोचता  कब   भोर   होगी

कब  समय अनुकूल  होगा

हर  खुशी   इस ओर होगी

हैं  अधर चुपचाप  मेरे भेद कुछ उर में गड़े हैं


अभिनव मिश्र अदम्य


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