गीत
गीत
*पाप दिन रात जग में कमाते रहे।*
*जन्म मानुष का विरथा गँवाते रहे।।*
आप आए यहाँ मुक्ति को खोजने।
सत्य के मार्ग की युक्ति को खोजने।।
आत्म अनुभूति पायी नहीं रंच भर।
मन विषय भोग में ही रमाते रहे।
*पाप दिन रात जग में कमाते रहे।*
*जन्म मानुष का विरथा गँवाते रहे।।*
ईश से लौ लगाने मिला जन्म था।
आत्म उत्थान पाने मिला जन्म था।।
छोड़ उद्देश्य पावन परित्राण का।
वासना की नदी में नहाते रहे।।
*पाप दिन रात जग में कमाते रहे।*
*जन्म मानुष का विरथा गँवाते रहे।।*
कामना की कुटिल चाल में फस गए।
भूमि थी दलदली आप क्यों धस गए।।
खेल प्रतिबिंब से खेलकर हे! मनुज।
मूल आराध्य से दूर जाते रहे।।
*पाप दिन रात जग में कमाते रहे।*
*जन्म मानुष का विरथा गँवाते रहे।।*
आप संसार में ही लिपट रह गए।
सत्य अभिसार बिन ही सिमट रह गए।।
सृष्टि सौंदर्य में लोभ पाला मगर।
क्यों सृजक से सदा मन चुराते रहे।।
*पाप दिन रात जग में कमाते रहे।*
*जन्म मानुष का विरथा गँवाते रहे।।*
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नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'
बहुत सुंदर सृजन
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