गीत

गीत

*पाप दिन रात जग में कमाते रहे।*
*जन्म मानुष का विरथा गँवाते रहे।।*

आप आए यहाँ मुक्ति को खोजने।
सत्य के मार्ग की युक्ति को खोजने।।
आत्म अनुभूति पायी नहीं रंच भर।
मन विषय भोग में ही रमाते रहे।
*पाप दिन रात जग में कमाते रहे।*
*जन्म मानुष का विरथा गँवाते रहे।।*

ईश से लौ लगाने मिला जन्म था।
आत्म उत्थान पाने मिला जन्म था।।
छोड़ उद्देश्य पावन परित्राण का।
वासना  की  नदी  में नहाते रहे।।
*पाप दिन रात जग में कमाते रहे।*
*जन्म मानुष का विरथा गँवाते रहे।।*

कामना की कुटिल चाल में फस गए।
भूमि थी दलदली आप क्यों धस गए।।
खेल प्रतिबिंब से खेलकर हे! मनुज।
मूल आराध्य  से  दूर जाते रहे।।
*पाप दिन रात जग में कमाते रहे।*
*जन्म मानुष का विरथा गँवाते रहे।।*

आप संसार में  ही लिपट रह गए।
सत्य अभिसार बिन ही सिमट रह गए।।
सृष्टि  सौंदर्य  में लोभ पाला मगर।
क्यों सृजक से सदा मन चुराते रहे।।
*पाप दिन रात जग में कमाते रहे।*
*जन्म मानुष का विरथा गँवाते रहे।।*

✍🏾
नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

नित्यानन्द वाजपेयी एक साहित्यिक परिचय

ग़ज़ल