माँ
ग़ज़ल
वही तो है कि जिससे वक्ष का श्रोणित पिलाया है।
मुझे रोते बिलखते से मेरी माँ ने हँसाया है।।
कई रातों वो सोई थी भरे गीले बिछौनों में,
मुझे मरहम से तन पर थपकियाँ देकर सुलाया है।
कभी लोरी कभी कजरी कभी किस्सों कहानी से,
मेरे बचपन को सुंदर संस्कारों से सज़ाया है।।
नहीं माँगा कभी कुछ भी न कुछ एहसाँ जताया था,
हमेशा नेह घट निःस्वार्थ माँ ने छलछलाया है।
मुझे सबकुछ थमाकर और ख़ुद चलती बनी है माँ,
किये आशीष की अब भी वो मेरे सर पे छाया है।।
नहीं नश्वर है यह रिश्ता अनश्वर आत्म गठबंधन,
सदा शाश्वत मेरी आत्मा ही माँ का 'नित्य' साया है।
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नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'
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