मुक्तक
[22/04, 15:01] नित्यानन्दवाजपेयीउपमन्यु🌹: विधाता छंद आधरित मुक्तक:- अधर की लालिमा से लाज खाते दल गुलाबों के। नयन दो झील या प्याले भरे दोनों शराबों के।। कमल दल से सुकोमल अंग आभा चंद्रिका जैसी। तुम्हारे नाज नखरे हैं वही जो हैं नवाबों के।। कमल को भीख में तुमने दिया है रंग यह अपना। दिखाया मोरनी मृग नागिनों को चाल का सपना।। सिखातीं क्षीरसागर को मनोभव सौम्यता तुम ही। तुम्हीं से सीख पाई जेष्ठ की दोपहर यूँ तपना।। तुम्हारे वाक हैं श्लोक गीता के परम पावन। चुनर धानी लहर जाए लगे ज्यों आ गया सावन।। तुम्हारा रूप वासंती चमकता चाँद है पीला। रँगीली राधिका हो तुम तुम्हारा श्याम रंगीला।। ✍🏾🎩🪘 नित्यानन्द वाजपेयी उपमन्यु [22/04, 18:49] नित्यानन्दवाजपेयीउपमन्यु🌹: मुक्तक उदासी छोड़ दो आओ तुम्हें हँसना सिखा दूँ मैं। हृदय में मीत के अपने तुम्हें बसना सिखा दूँ मैं।। बहुत मीठी बहुत मनहर चुभन है प्रेम की मधुमय। भ्रमर! तुमको कुसुम के अंक में फँसना सिखा दूँ मैं।। नित्यानन्द वाजपेयी उपमन्यु