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मेरा सावन सूखा सूखा

शीर्षक- मेरा सावन सूखा सूखा विधा- गीत विरह व्यथा की विकल रागिनी बजती     अब     अंतर्मन     में कितनी   आस   लगा   बैठे  थे हम   उससे    इस    सावन   में बरस रहे हैं  मेघा  काले  फिर भी  मेरा मन  मरुथल चलतीं शीतल मन्द हवाएं  जलता मेरा तन पल-पल सोचा था इस सावन में कुछ  उससे मेरी  बात बनेगी उसके नैनों के प्याले को पीकर मन की प्यास बुझेगी लगता  है  अब  विरह  वेदना लिखी     हमारे    जीवन   में कितनी   आस  लगा  बैठे  थे हम   उससे   इस   सावन  में पतझड़ को हम झेल चुके थे आस लगी थी सावन की शायद  प्रेम  कहानी  कोई   बन  जाए  मनभावन  की लेकिन आशाओं  की किरणे इस सावन में दिखी नही सजी  हिना  से  नर्म  हथेली  भाग्य  हमारे लिखी नही संदल    सी...
 मनमनोरम छन्द 2122 2122 2122 2122 जिंदगी के आज ऐसे मोड़ पर आकर खड़े हैं देखकर   हालात  उर  उद्गार  मेरे  रो  पड़े  हैं मन  व्यथित  है  आज   मेरा  तन    थका     लाचार      है दीप  आशा    का   बुझा   है हर     तरफ    अँधियार    है है   समय   प्रतिकूल  अपना पंथ    कंटक    से    भरे    हैं चैन  अब  मिलता  नही  हम घोर    विपदा    में    घिरे   हैं चल रहा प्यासा पथिक यह दूर पानी के घड़े हैं कर   रहे   संघर्ष   प्रतिदिन बस   निराशा   हाथ  लगती है   तमस   में  जिंदगी   यह आस की किरणें न  दिखती दरबदर   मिलती  हैं  ठोकर टूटते     हैं    आज     ...

गीत

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ग़जल

विधा --गजल अपने इस अहल-ए- वतन पर जो फ़िदा हो जाएगा। इस चमन में बस उसी का क़ायदा हो जाएगा।। खुद की हस्ती को मिटाना सबके बस में है नहीं, मिट सका ग़र तो वही फिर नाख़ुदा हो जाएगा।। आज़ कलियां हैं परागित चूमते कितने भ्रमर, जब ख़िज़ाँ आयेगी तब भँवरा ज़ुदा हो जाएगा। है हमारी माँ का ओहदा इस जहां में उच्चतर, क़र्ज़ क्या इस जन्म में उनका अदा हो जाएगा? खून में मेरे महक है इस वतन की ख़ाख की, ख़ाख में मिलकर इसी की यह फ़ना हो जाएगा।। ज़ख्म मेरे दिल में कोई सूखता सा था मग़र, शाज़िसाना हरक़तों से फ़िर हरा हो जाएगा।। खोके मिट्टी में वतन की 'नित्य' गुल बनकर खिलो। तब वतन महबूब मेरा ख़ुशनुमा हो जाएगा।। 🖊️ नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'

ग़जल

ग़जल  बह्र: 121 22 121 22 वो' जब से' दिल में उतर गये हैं ख़ुदा क़सम हम  सँवर गये हैं।। मिज़ाज में है अज़ीब शोख़ी , उसी में' खोकर बिखर गये हैं कली हज़ारों हैं' गुलशनों में, मग़र उन्हीं पर ठहर गये हैं।। अशआर मेरा हुआ मुख़ातिब,  पढ़ा तो' कितना निखर गये हैं। गुलाब की पाँखुरी मुक़म्मल, मश्रण पे' मेरे अधर गये हैं।। वहीं हैं अबतक जहाँ मिले थे , इधर गये ना उधर गये हैं।। कि 'नित्य' उनका इलाज़ है क्या ? , जो' मर गये या मुकर गये हैं। 🖊️ नित्यानन्द वाजपेयी "उपमन्यु"

यशोगान

 *गीत*  मुक्त कण्ठ से आज सुनो मैं, वीर प्रसंशा गाता हूँ। अमर शहीदों की कुछ पीड़ा, तुमको पुनः सुनाता हूँ।। जिनने भारत की रक्षा हित,अपने प्राण गँवाये हैं। जिनकी माता नें समुद्र भर, अपने अश्रु बहाए हैं।। उनकी गाथा गायन कर के, तुमको आज रुलाता हूँ। अमर शहीदों की कुछ पीड़ा, तुमको पुनः सुनाता हूँ।। चंद्र,भगत,बिस्मिल,सुभाष जी,अपनी माँ के बेटे थे। इसीलिए अंग्रेज हजारों ,पड़ते उनसे हेटे थे।। ठान लिया करके दिखलाया,साहस पे बलिजाता हूँ। अमर शहीदों की कुछ पीड़ा, तुमको पुनः सुनाता हूँ।। भारत की मिट्टी का प्रतिकण, निज श्रोणित से सींचा था। जर्नल डायर को ऊधम ने,मार सड़क पर खींचा था।। ऐसे वीर शिरोमणियों के ,करतब कह दोहराता हूँ। अमर शहीदों की कुछ पीड़ा, तुमको पुनः सुनाता हूँ।। उस भारत को दो टुकड़ों में, तुमने जब तोड़ा गाँधी। तब उन शौर्यशालियों के ,मन में उट्ठी होगी आँधी।। काश्मीर पर वोट बैंक हित,पंडित को झुठलाता हूँ। अमर शहीदों की कुछ पीड़ा, तुमको पुनः सुनाता हूँ।। जब कश्मीरी पण्डित की,चीत्कारें दिल दहलाती हैं। उनकी बहू बेटियां जब,सड़कों पर लूटी जाती हैं।। तब लोहू उन बलिदानों का,क्या कहता बतलाता हूँ। अमर श...

नग़मा

 *नग़मा*   हूँ आप का नसीब ज़रा पास आइये।  ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।।  दिन आज का हसीन बड़ा आप साथ हैं।  ये गुल नशे में चूम रहे सुर्ख़ हाथ हैं।।  मौसम पुकारता है मधुर गीत गाइये।  ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।।   मुद्दत से' शाम आज ये' रंगीन हो रही।  फ़िर क्यों नज़र हुज़ूर कि ग़मगीन हो रही।।  क्या है अज़ीब राज हमें भी सुनाइये।  ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।।  बेज़ार वो कली जो' खिली फूल है बनी।  है ओस की हसीन फ़िज़ा रंग में सनी।।  अब रूठ बैठिये न दिले दर्द पाइये।।  ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।।   हम हैं हबीब आप फ़क़त नस्र हो हमें।  क्यों काँपते गुलाब से' लब सुर्ख़ हैं थमें।  मत रोकिये इन्हें क़रीब और लाइये।।  ऐसे न रूठिये न अभी दूर जाइये।।   🖊️🌹🌹🌹🌹🌹🌹  नित्यानन्द वाजपेयी 'उपमन्यु'