मेरा सावन सूखा सूखा
शीर्षक- मेरा सावन सूखा सूखा विधा- गीत विरह व्यथा की विकल रागिनी बजती अब अंतर्मन में कितनी आस लगा बैठे थे हम उससे इस सावन में बरस रहे हैं मेघा काले फिर भी मेरा मन मरुथल चलतीं शीतल मन्द हवाएं जलता मेरा तन पल-पल सोचा था इस सावन में कुछ उससे मेरी बात बनेगी उसके नैनों के प्याले को पीकर मन की प्यास बुझेगी लगता है अब विरह वेदना लिखी हमारे जीवन में कितनी आस लगा बैठे थे हम उससे इस सावन में पतझड़ को हम झेल चुके थे आस लगी थी सावन की शायद प्रेम कहानी कोई बन जाए मनभावन की लेकिन आशाओं की किरणे इस सावन में दिखी नही सजी हिना से नर्म हथेली भाग्य हमारे लिखी नही संदल सी...