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गीत

नज़्म (गीत) *मेरी तनहाई को अंगारा बनाया न करो।* *या तो' आजाओ' या' फिर याद भी' आया न करो।।* कितनी मुश्किल से सँभाला है आज फिर मन को। तेरी यादों ने रुलाया है आज फिर मन को।। ख़्वाब मिलने का मुझे ऐसे दिखाया न करो। *या तो' आजाओ' या' फिर याद भी' आया न करो।।* रेत तपती मेरे एहसासों की है धू-धू कर। उसपे यादों की अगन जाती मुझे छू छू कर।। इस क़दर जिस्म-ओ- ज़हन मेरा जलाया न करो। *या तो' आजाओ' या' फिर याद भी' आया न करो।।* खिड़कियां तेरे ही रस्तों को निहारा करतीं। आहटें आने का जब-जब भी इशारा करतीं।। मुझमें यूं ज्वार मुहब्बत का उठाया न करो। *या तो' आजाओ' या' फिर याद भी' आया न करो।।* रोज तुम कहते हो कल आके मिलूंगा तुमसे। होके दुनिया में सफल आके मिलूंगा तुमसे।। अपनी तक़दीर को इतना भी सताया न करो। *या तो' आजाओ' या' फिर याद भी' आया न करो।।* ✍🏾 नित्यानन्द वाजपेयी "उपमन्यु"

गीत

ग़ज़ल ज़माने को वो बरगलाती है क्या क्या। महज़ झूठ लेकिन बताती है क्या क्या।। फरेबों की चादर में खुद को लपेटे, वो चांद और सूरज  बुझाती है क्या क्या।  वो सच को मेरे झूठ साबित कराने, ज़माने में जाने लुटाती है क्या क्या। *किसी और के तेरे मेरे सभी के,* *चुरा गीत दुनिया छपाती क्या क्या।* ज़माने में शुहरत कमाने को वो अब, लिखा तेरा मेरा चुराती है क्या क्या।। सिखाता रहा "नित्य" मेहनत जिसे मैं, वो मेहनत बिना जाने पाती है क्या क्या।।  ✍🏾🪷🤭 नित्यानन्द वाजपेयी "उपमन्यु"

गीत

गीत *निर्झरिणी झर-झर कर अविरल , निस्तब्ध निशा में शोर भरे।* *अरुणोदय अरुणाचल का  शुभ, सबसे पहले नवभोर करे।।* कच्ची भूधरियों की उर्वर , छाती हरियाली से लहके। वन में अनेक फल मूल कंद , मकरंद फूलपाती महके।। मधु स्निग्ध गंध से दसों दिशा, नंदनवन का आभास भरें। तितलियां दलों में फिरतीं यों, ज्यों हरित सिंधु में यान तरें।। वसुधा निज वक्ष निचोड़ रही, पयमृत की मधुरिम धार झरे। *अरुणोदय अरुणाचल का  शुभ, सबसे पहले नवभोर करे।।* कदली दल चंवर डुलाते हैं, साम्राज्ञी हरियाली के प्रति। उन्नत वक्षस्थल ऊष्णआर्द्र, ऊष्मित द्रुम वस्त्र ढली अनुकृति।। बाँसों के गहन वस्त्र पहने, ले प्रकृति सुंदरी अंगड़ाई। बेलें वृक्षों से अवगुंठित, छाई दिगंत पर मदनाई।। मन का मालिन्य मांद्यता सब, सरिताओें की जलधार हरे। *अरुणोदय अरुणाचल का  शुभ, सबसे पहले नवभोर करे।।* बदली का चुंबन लेने को, आशान्वित हैं यह तुंग श्रृंग। कोमल रसवंती कलियों पर, मंडराते मोहित नवल भृंग।। मरकत के दानों से बिखरे, दस-बीस घरों के विरल ग्राम। लाखों वनचर द्रुमचर विहंग, लाखों सरीसृपों हेतु धाम।। कितने ही प्रतिदिन धरें देह, जीवन का झुंड यहां विहर...

गीत

गीत *सुना है तुम भी किसी रब की बात करते हो।* *गलों को काट ये किस ढब की बात करते हो।।* न कोई दीन न ईमान कहेगा ऐसा। न तो इलाह न भगवान कहेगा ऐसा।। न जाने कौन से करतब की बात करते हो। *गलों को काट ये किस ढब की बात करते हो।।* वतन में चैन-ओ-अमन और सुकूं रहे वो' करो! सभी के साथ जियो और दिलों में प्यार भरो। मिटा के आम को मंसब की बात करते हो। *गलों को काट ये किस ढब की बात करते हो।।* वजूद मुल्क के बिन क्या कहीं तुम्हारा है। इसी ने पाला' क़दम दर क़दम संवारा है।। जला के इसको ही मज़हब की बात करते हो। *गलों को काट ये किस ढब की बात करते हो।।* ✍🏾🌹💓🌹🪷🪷🪷 नित्यानन्द वाजपेयी "उपमन्यु"

गीत

गीत *पोखर तालाब सरोवर के, अंतस को मरते देखा है।* *इन रुग्ण हुई सरिताओं के, रस में विष भरते देखा है।।* देखा है मैंने नग्न नृत्य, इस भौतिकता की डायन का। सरकारों   द्वारा  घोषपत्र, में  झूठे जुमले गायन का।। सारे वादों-संवादों का, मदमोह बिखरते देखा है। *इन रुग्ण हुई सरिताओं के, रस में विष भरते देखा है।।* उद्योग क्रांति के अजगर ने, वन उपवन सारे निगल लिए। वसुधा की चूनर को उघाड़, सब वस्त्र उतारे निगल लिए।। मेघों का चित्त फटा उनको, डूबते उछरते देखा है। *इन रुग्ण हुई सरिताओं के, रस में विष भरते देखा है।।* है द्रवित हृदय हिमनद का भी, पिघला दिखलाई दिया मुझे। ज्वलामुखियों का अंतर्मन,उमगा दिखलाई दिया मुझे।।  गैसें विषाक्त वतायन की,नर को नित करते देखा है। *इन रुग्ण हुई सरिताओं के, रस में विष भरते देखा है।।* चिमनी से विष का उत्सर्जन, अपविष्टों से सरिता मर्दन। भूतल पहाड़ नभ वन उपवन, सबका मर्दन सबका दोहन।। पेट्रो ईंधन की विष बेलों , को "नित्य" अखरते देखा है। *इन रुग्ण हुई सरिताओं के, रस में विष भरते देखा है।।* हे! मनुसुत अब तो जाग नहीं, रसहीन धरा हो जायेगी। जीवन विहीन जल थल नभ म...

विश्व योग दिवस

*विश्व योग दिवस के पावन पर्व पर!* गीत *ज्ञान दीपक जला लो हृदय का मनुज,* *रोशनी से जगत जगमगा जाएगा।* *विश्व की आपदाएं मिटेंगी सभी,* *हर्ष उल्लास मनको लुभा जाएगा।।* स्वार्थ का जो अंधेरा मनों में बसा, है निगलने लगा आज आवाम को। लोभ-रावण खड़ा तान तलवार अब, और ललकारता है पुनः राम को।। यदि मिटेगा नहीं आर्थिक आचरण, तो सुनो यह सभी को मिटा जाएगा।। *ज्ञान दीपक जला लो हृदय का मनुज,* *रोशनी से जगत जगमगा जाएगा।* युद्ध है अर्थ का यह महा नाश को, नर हुआ भौतिकी का उपासक यहां। दंभ बारूद है दर्प बाती बना, और चिंगारियाँ है कुशासक यहां।। मौत का तांडवी नृत्य आतुर हुआ, यह अखिल विश्व की जड़ हिला जाएगा।। *ज्ञान दीपक जला लो हृदय का मनुज,* *रोशनी से जगत जगमगा जाएगा।* लौट आध्यात्मिक ज्ञान की ओर फिर, सर्व कल्याण हित शोध खुद में करो। व्यक्तिगत शुद्धतामय करो आचरण, सर्व समभाव पथ पर कदम तुम धरो। व्यक्ति में ब्रह्म का नित्य दर्शन करो, जीव चैतन्य प्रभु में समा जाएगा।। *ज्ञान दीपक जला लो हृदय का मनुज,* *रोशनी से जगत जगमगा जाएगा।* योग अष्टांग से नष्ट शुद्ध तन मन करो,  और पावन बनो मन वचन कर्म से। सांप्रदायिक नहीं स...

मुट्ठीभर हिमालय

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